इक हसीं तोहफ़ा है या कोई बला ये ज़िंदगी
है समझ से ही परे आख़िर है क्या ये ज़िंदगी
बा'द मरने के ही देना है अगर जन्नत हमें
तो दिया ही क्यूँ हमें दोज़ख़-नुमा ये ज़िंदगी
संग-दिल सय्याद जैसी है सभी के वास्ते
या हमें ही लग रही है इक सज़ा ये ज़िंदगी
सारी दुनिया की ख़ुशी है क्या अमीरों के लिए
क्यूँ ग़रीबों के लिए है बद-दुआ ये ज़िंदगी
आख़िरत और मौत की ही करते हैं तलक़ीन सब
मौत ही बर-हक़ है तो ना-हक़ है क्या ये ज़िंदगी
हर क़दम पर इम्तिहाँ ये ज़िंदगी लेती है क्यूँ
खेलती है दिल से क्यूँ बे-इंतिहा ये ज़िंदगी
देख लेना छोड़ जाएगी कहीं पर भी 'उमर'
यूँ ही कहलाती नहीं है बे-वफ़ा ये ज़िंदगी
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














