किस किस की बे-रुख़ी का निशाना नहीं हूँ मैं
वो कौन सा है तंज़ जो सुनता नहीं हूँ मैं
यूँ बद-गुमान मत हो मेरी बे-शनाख़्त पर
दिखता तो कुछ नहीं हूँ मगर क्या नहीं हूँ मैं
आख़िर बनूँ भी कैसे किसी का मैं नाख़ुदा
मुझ में भी इक भँवर है किनारा नहीं हूँ मैं
कैसे भुला दूँ उन की जफ़ा उन का हर सितम
होश-ओ-हवास में हूँ दिवाना नहीं हूँ मैं
इतना तो है सुकून कि बे-रंग मैं नहीं
हर रंग ज़िंदगी के हैं सादा नहीं हूँ मैं
मुझ को न पढ़ सकोगे मेरी शक़्ल देख कर
लम्बी सी दास्ताँ हूँ ख़ुलासा नहीं हूँ मैं
यूँ अजनबी नज़र से मुझे देख मत 'उमर'
इंसान ही हूँ मैं भी अनोखा नहीं हूँ मैं
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














