कुछ ख़लिश ही दिल में थी न कोई भी मलाल था
ख़ुश था अपने हाल पे मैं जो भी मेरा हाल था
वो जुनून-ए-इश्क़ या दिवानगी थी वो मेरी
जब तलक थी ज़िंदगी उसी का ही ख़याल था
कहने को तो दोनों ख़ुश थे अपनी ज़िंदगी से पर
तन्हा-तन्हा जीना भी तो किस क़दर मुहाल था
चल पड़ा था आँख मूँदे मैं भी उस के साथ में
फ़िक्र धूप-छाँव की न वहशत-ए-ज़वाल था
मौत ही है आख़िरी पड़ाव ज़िंदगी का क्यूँ
हर किसी के सामने यही बड़ा सवाल था
ज़िंदगी थी या कोई बला थी मेरे सर 'उमर'
मुश्किलें थीं साथ-साथ हर क़दम पे जाल था
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














