शबनम की सर्द बूँद न आतिश-फ़िशाँ हूँ मैं
जो कुछ हूँ सामने हूँ मैं सब पे अयाँ हूँ मैं
मुझ को ही ये ख़बर नहीं क्या हूँ मैं क्या नहीं
इतना ही जानता हूँ कि अहल-ए-जहाँ हूँ मैं
ख़ुश-आमदीद कैसे कहूँ मैं बहार को
निस्बत जिसे ख़िज़ाँ से है वो गुलसिताँ हूँ मैं
फ़ुर्सत में गर हों आप तभी हाल पूछिए
छोटी सी कोई बात नहीं दास्ताँ हूँ मैं
कोई पुकारता मुझे तो क्यूँ पुकारता
कोई ख़ुदा रसूल न कोई बुताँ हूँ मैं
ख़ुद को चला था ढूँढ़ने खो बैठा ख़ुद को ही
अब अर्श पे न फ़र्श पे जाने कहाँ हूँ मैं
कोशिश तो कर के देखिए मुझ को समझने की
मैं हूँ खुली किताब कहा कब निहाँ हूँ मैं
रखते हैं लोग मुझ से बना कर के फ़ासला
सच बोलता हूँ सब के लिए बद-ज़ुबाँ हूँ मैं
ख़ातिर में अपनी कोई भी लाता नहीं 'उमर'
सब की नज़र में आज भी उजड़ा मकाँ हूँ मैं















