दिल का आलम अजीब रहता है
जब ख़याल-ए-हबीब रहता है
पूरी कोशिश है उस को पाने की
बाक़ी देखो नसीब रहता है
जब भी सोचूँ तिरे बिछड़ने का
एक मंज़र मुहीब रहता है
तेरा ठुकराया इक गरीब बशर
देखो कब तक गरीब रहता है
शहर की इक गली नहीं बाक़ी
हर गली में रक़ीब रहता है
हैं 'अजब दूरियाँ कि वो 'क़ैसर'
हदस बढ़कर क़रीब रहता है
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