ख़ुदा जाने वो क्यूँँकर इस क़दर हम को सताते हैं
सितम फिर ये कि फिर वो ही हमारे मन को भाते हैं
यही दस्तूर है शायद ज़माने की मोहब्बत का
जिसे हम प्यार करते हैं वही दिल को दुखाते हैं
संभल कर बैठना तुम इम्तिहान-ए-''इश्क़ में साहब
ये वो पर्चा है जिस में लोग अक्सर मात खाते हैं
हमें तुम ऐसा-वैसा ऐरा-ग़ैरा मत समझ लेना
जो कुछ हम पर गुज़रती है वही तुमको सुनाते हैं
रियाज़ी फ़लसफ़ा साइंस ये भी ठीक है लेकिन
कहाँ हम अपने बच्चों को मगर उर्दू सिखाते हैं
वो कैसे लोग हैं जो चार दिन बस 'इश्क़ करते हैं
फिर उसके बाद सारे रिश्ते नाते भूल जाते हैं
कहाँ अब वो भी हमको वक़्त देते हैं बहुत अशरफ़
सो हम भी शाम को घर जल्दी वापस लौट आते हैं
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