khuda jaane vo kyunkar is qadar ham ko sataate hain | ख़ुदा जाने वो क्यूँँकर इस क़दर हम को सताते हैं

  - Meem Maroof Ashraf

ख़ुदा जाने वो क्यूँँकर इस क़दर हम को सताते हैं
सितम फिर ये कि फिर वो ही हमारे मन को भाते हैं

यही दस्तूर है शायद ज़माने की मोहब्बत का
जिसे हम प्यार करते हैं वही दिल को दुखाते हैं

संभल कर बैठना तुम इम्तिहान-ए-''इश्क़ में साहब
ये वो पर्चा है जिस में लोग अक्सर मात खाते हैं

हमें तुम ऐसा-वैसा ऐरा-ग़ैरा मत समझ लेना
जो कुछ हम पर गुज़रती है वही तुमको सुनाते हैं

रियाज़ी फ़लसफ़ा साइंस ये भी ठीक है लेकिन
कहाँ हम अपने बच्चों को मगर उर्दू सिखाते हैं

वो कैसे लोग हैं जो चार दिन बस 'इश्क़ करते हैं
फिर उसके बाद सारे रिश्ते नाते भूल जाते हैं

कहाँ अब वो भी हमको वक़्त देते हैं बहुत अशरफ़
सो हम भी शाम को घर जल्दी वापस लौट आते हैं

  - Meem Maroof Ashraf

Ghayal Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meem Maroof Ashraf

As you were reading Shayari by Meem Maroof Ashraf

Similar Writers

our suggestion based on Meem Maroof Ashraf

Similar Moods

As you were reading Ghayal Shayari Shayari