फ़रेबी था बहुत सच्चा नहीं था
वो अपने अहद का पक्का नहीं था
हमेशा तंज़ ही कसता था सब पर
कि जैसे कोई उस जैसा नहीं था
सलीक़ा ही नहीं था पास उस के
मगर तहज़ीब को भूला नहीं था
किसी बाज़ार में क़ीमत नहीं थी
कोई सिक्का भी वो खोटा नहीं था
हमारी आदतें बिल्कुल अलग थीं
मगर इस बात पर झगड़ा नहीं था
लगी उस को हवा थी शहर वाली
मकाँ भी गाँव का कच्चा नहीं था
सुख़न का शौक़ हम को था नहीं जब
तो महफ़िल से कोई रिश्ता नहीं था
कहाँ थी क़द्र कुछ भी तो कहीं पर
हमारे पास जब पैसा नहीं था
ग़ज़ल कहती भला 'मीना' मैं कैसे
मुताबिक मन के जब मिसरा नहीं था
मीना भट्ट सिद्धार्थ
— Meena Bhatt















