हर समय नौहा-ज़नी अच्छी नहीं

इस क़दर मुर्दा-दिली अच्छी नहीं

वो कहीं जाँ की न दुश्मन ही बने
इतनी भी छींटाकशी अच्छी नहीं

इतने भी बरहम बनो आख़िर न तुम
ख़ुद से ख़ुद की मुख़बिरी अच्छी नहीं

रोज़ नख़रे ये दिखाती है हमें
ज़ीस्त इतनी नकचढ़ी अच्छी नहीं

ताज बस झूठे पहनते हैं यहाँ
अब वफ़ा की यूँ कमी अच्छी नहीं

खो गए माज़ी की यादों में तो आज
इतनी अब संजीदगी अच्छी नहीं

वो अदब तहज़ीब भूले हैं सभी
इतनी लेकिन ख़ुद-सरी अच्छी नहीं

क़त्ल करते हो उमीदों का मेरी
इश्क़ में ये रह-ज़नी अच्छी नहीं

ख़ुद ही दिल पे हक़ जमा कर बैठे तुम
इतनी 'मीना' ख़ुर्दगी अच्छी नहीं

— Meena Bhatt

More by Meena Bhatt

Other ghazal from the same pen

See all from Meena Bhatt →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling