मेरा दिल क्यों तेरी जाँ होता है

तू जहाँ है ये वहाँ होता है

इस का सब को ही गुमाँ होता है
दर्द आँखों से बयाँ होता है

बे-ख़बर कोई कहाँ होता जब
फैला उल्फ़त का धुआँ होता है

हर तरफ़ फैली है नफ़रत जब से
अब कहाँ अम्न-ओ-अमाँ होता है

जब क़दम पड़ते यहाँ पर तेरे
ख़ूब-सूरत ये मकाँ होता है

नाम जब लेता है कोई तेरा
दर्द क्यों दिल का जवाँ होता है

दिल-नशीं अब नहीं 'मीना' अपने
हम को क्यों ऐसा गुमाँ होता है

— Meena Bhatt

More by Meena Bhatt

Other ghazal from the same pen

See all from Meena Bhatt →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling