पल भर में मुहब्बत का अफ़साना बना दूँगी
मैं शम्अ' का तुम को भी परवाना बना दूँगी
बीते हुए लम्हे फिर वापस नहीं आते हैं
गुज़रा जो ज़माना मैं बेगाना बना दूँगी
क़िस्मत का करम मुझ पर हो जाए ज़रा फिर मैं
इस सारे ज़माने को दीवाना बना दूँगी
मय-ख़्वारी अगर तेरी ज़िद है तो यक़ीं रख तू
मैं तेरे लिए घर को मयख़ाना बना दूँगी
छलकाती रहूँगी मय हर रोज़ निगाहों से
दीदार मिले फिर मैं पैमाना बना दूँगी
गर काँटे चुभे तुझ को फूलों के चमन में तो
गुलज़ार चमन को भी वीराना बना दूँगी
शिकवा करूँ मैं क्यूँ कर उस की जफ़ा का मीना
हर ग़म को मुहब्बत का नज़राना बना दूँगी
— Meena Bhatt















