उम्र भर बस ये रोज़गार किया

तेरा शिद्दत से इंतिज़ार किया

बे-सबब ख़ुद को दाग़दार किया
जाने क्यूँ तेरा ऐतिबार किया

ज़ीस्त में अब न लुत्फ़ है कोई
क्या कहें घर को ही मज़ार किया

सिर्फ़ धोखे मिले मुहब्बत में
हम ने आँखों को अश्कबार किया

किस से मिलती है धूप बारिश ये
किस ने मौसम को ख़ुशगवार किया

मेरी हालत कहाँ सुधरनी थी
कितनी मुश्किल से कुछ सुधार किया

जाँ से प्यारी लगी हमें 'मीना'
उस पे अपना ये दिल निसार किया

— Meena Bhatt

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