boo ki ho soo-e-baagh nikle hai | बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है

  - Meer Taqi Meer

बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है
बाव से इक दिमाग़ निकले है

है जो अंधेर शहर में ख़ुर्शीद
दिन को ले कर चराग़ निकले है

चोब-कारी ही से रहेगा शैख़
अब तो ले कर चुमाग़ निकले है

दे है जुम्बिश जो वाँ की ख़ाक को बाव
जिगर दाग़ दाग़ निकले है

हर सहर हादिसा मिरी ख़ातिर
भर के ख़ूँ का अयाग़ निकले है

उस गली की ज़मीन-ए-तफ़्ता से
दिल-जलों का सुराग़ निकले है

शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर'
बाव में इक दिमाग़ निकले है

  - Meer Taqi Meer

Sooraj Shayari

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