दीवानगी में मजनू मेरे हुज़ूर क्या था
लड़का सा उन दिनों था उस को शु'ऊर क्या था
गर्दन कशी से अपनी मारे गए हम आख़िर
आशिक़ अगर हुए थे नाज़-ओ-ग़ुरूर क्या था
ग़म क़ुर्ब-ओ-बाद का था जब तक न हम ने जाना
अब मर्तबा जो समझे वो इतना दूर क्या था
ऐ वाए, ये न समझे मारे पड़ेंगे इस
में
इज़हार-ए-इश्क़ करना हम को ज़ुरूर क्या था
मरता था जिस की ख़ातिर उस की तरफ़ न देखा
मीर-ए-सितम रसीदा ज़ालिम ग़ुयूर क्या था
— Meer Taqi Meer















