ga.e jee se chhoote buton ki jafaa se | गए जी से छूटे बुतों की जफ़ा से

  - Meer Taqi Meer

गए जी से छूटे बुतों की जफ़ा से
यही बात हम चाहते थे ख़ुदास

वो अपनी ही ख़ूबी पे रहता है नाज़ाँ
मरो या जियो कोई उस की बला से

कोई हम से खुलते हैं बंद उस क़बा के
ये उक़्दे खुलेंगे कसो की दुआ से

पशेमान तौबास होगा अदम में
कि ग़ाफ़िल चला शैख़ लुत्फ़-ए-हवा से

न रखी मिरी ख़ाक भी उस गली में
कुदूरत मुझे है निहायत सबास

जिगर-सूई-ए-मिज़्गाँ खिंचा जाए है कुछ
मगर दीदा-ए-तर हैं लोहू के प्यासे

अगर चश्म है तो वही ऐन हक़ है
तअ'स्सुब तुझे है 'अजब मा-सिवा से

तबीब सुबुक-ए-अक़्ल हरगिज़ न समझा
हुआ दर्द-ए-इश्क़ आह दूना दवा से

टक ऐ मुद्दई' चश्म-ए-इंसाफ़ वा कर
कि बैठे हैं ये क़ाफ़िए किस अदास

न शिकवा शिकायत न हर्फ़-ओ-हिकायत
कहो 'मीर' जी आज क्यूँँ हो ख़फ़ा से

  - Meer Taqi Meer

Doctor Shayari

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