गए जी से छूटे बुतों की जफ़ा से
यही बात हम चाहते थे ख़ुदास
वो अपनी ही ख़ूबी पे रहता है नाज़ाँ
मरो या जियो कोई उस की बला से
कोई हम से खुलते हैं बंद उस क़बा के
ये उक़्दे खुलेंगे कसो की दुआ से
पशेमान तौबास होगा अदम में
कि ग़ाफ़िल चला शैख़ लुत्फ़-ए-हवा से
न रखी मिरी ख़ाक भी उस गली में
कुदूरत मुझे है निहायत सबास
जिगर-सूई-ए-मिज़्गाँ खिंचा जाए है कुछ
मगर दीदा-ए-तर हैं लोहू के प्यासे
अगर चश्म है तो वही ऐन हक़ है
तअ'स्सुब तुझे है 'अजब मा-सिवा से
तबीब सुबुक-ए-अक़्ल हरगिज़ न समझा
हुआ दर्द-ए-इश्क़ आह दूना दवा से
टक ऐ मुद्दई' चश्म-ए-इंसाफ़ वा कर
कि बैठे हैं ये क़ाफ़िए किस अदास
न शिकवा शिकायत न हर्फ़-ओ-हिकायत
कहो 'मीर' जी आज क्यूँँ हो ख़फ़ा से
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