"हद है"

क्या! कैसे! मैं यहाँ कैसे मैं तो पार्क में बैठा एक नज़्म लिख रहा था ना, तो ये कैसे, मैं यहाँ कैसे! देखता हूँ कोई 'गर हो आसपास जो समझाए मुझे कि ये जो हुआ, आख़िर हुआ कैसे, मैं यहाँ कैसे

हाँ, एक शख़्स नज़र आया तो है, नज़दीक जाऊँ ज़रा पूछूँ अपने इस हाल का सबब उस से

जी आदाब, मेरे इधर होने की वजह से क्या आप वाक़िफ हैं? 'गर हाँ तो बतलाएँ ज़रा! देखिए जनाब मुआमला दरअसल ये है आप ही के दिल ने अपने काम से जी चुराया और इस सबब से ज़िंदगी आप की तमाम हो गई, ख़ैर, मैं चलता हूँ , ख़ुदा हाफ़िज़

या इलाही ये क्या ग़लती दिल की रुकी धड़कन! मगर मौत मेरी हद है

— Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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