paa-b-daaman ho raha hooñ bas-ki main sahra-navard | पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द

  - Mirza Ghalib

पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द
ख़ार-ए-पा हैं जौहर-ए-आईना-ए-ज़ानू मुझे

देखना हालत मिरे दिल की हम-आग़ोशी के वक़्त
है निगाह-ए-आश्ना तेरा सर-ए-हर-मू मुझे

हूँ सरापा साज़-ए-आहंग-ए-शिकायत कुछ न पूछ
है यही बेहतर कि लोगों में न छेड़े तू मुझे

बाइस-ए-वामांदगी है उम्र-ए-फ़ुर्सत-जू मुझे
कर दिया है पा-ब-ज़ंजीर-ए-रम-ए-आहू मुझे

ख़ाक-ए-फ़ुर्सत बर-सर-ए-ज़ौक़-ए-फ़ना ऐ इंतिज़ार
है ग़ुबार-ए-शीशा-ए-साअत रम-ए-आहू मुझे

हम-ज़बाँ आया नज़र फ़िक्र-ए-सुख़न में तू मुझे
मर्दुमुक है तूती-ए-आईना-ए-ज़ानू मुझे

याद-ए-मिज़्गाँ में ब-नश्तर-ए-ज़ार-ए-सौदा-ए-ख़याल
चाहिए वक़्त-ए-तपिश यक-दस्त सद-पहलू मुझे

इज़्तिराब-ए-उम्र बे-मतलब नहीं आख़िर कि है
जुसतुजू-ए-फ़ुर्सत-ए-रब्त-ए-सर-ए-ज़ानू मुझे

चाहिए दरमान-ए-रीश-ए-दिल भी तेग़-ए-यार से
मरम-ए-ज़ंगार है वो वसमा-ए-अबरू मुझे

कसरत-ए-जौर-ओ-सितम से हो गया हूँ बे-दिमाग़
ख़ूब-रूयों ने बनाया 'ग़ालिब'-ए-बद-ख़ू मुझे

फ़ुर्सत-ए-आराम-ए-ग़श हस्ती है बोहरान-ए-अदम
है शिकस्त-ए-रंग-ए-इम्काँ गर्दिश-ए-पहलू मुझे

साज़-ए-ईमा-ए-फ़ना है आलम-ए-पीरी 'असद'
क़ामत-ए-ख़म से है हासिल शोख़ी-ए-अबरू मुझे

  - Mirza Ghalib

Nazar Shayari

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