अभी बदन का ख़ून नया है अभी बहाना बाक़ी हैअभी लहू से भाल सजाना तिलक लगाना बाक़ी हैअभी कहाॅं वो ज़ेहन हुआ है जो छूने भर से ढह जाएअभी अज़ल पर नाम वतन का अमर कराना बाक़ी है— Krishna Mishra