यूँँ अपना सब्र खो बैठा है पागल

मगर तुम आओ तो बैठा है पागल

वो सब से चाल गहरी चल रहा है
तुम्हारे साथ जो बैठा है पागल

शब-ए-ग़म अश्कों की बारिश हुई थी
तुम्हारे ख़त भिगो बैठा है पागल

वही कमबख़्त लोगों मसख़रा है
जो भी क़िस्मत पे रो बैठा है पागल

तफ़क्कुर में कहीं वो जा चुका है
नहीं पागल वो जो बैठा है पागल

जुनूँ नज़दीक उस के अब खड़ा है
किसी से दूर जो बैठा है पागल

— Miyan Umar

More by Miyan Umar

Other ghazal from the same pen

See all from Miyan Umar →

Baarish Shayari

Shers of baarish.

All Baarish Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling