बैठे बैठे हम ये कैसे जाल में उलझ गए
यार फिर से हम तिरे ख़याल में उलझ गए
उन से कैसे ख़द-ओ-ख़ाल के तक़ाज़े पूरे हों
छोड़ कर जबीं जो तेरे बाल में उलझ गए
क्यूँ हमारे ही उलझने पर हो तन्ज़ जब के याँ
अच्छे अच्छे हुस्न ओ जमाल में उलझ गए
सिर्फ़ इक सवाल-ए-वस्ल था उसी पे हँस के बोले
छोड़िए न आप किस सवाल में उलझ गए
वो भी जा बसा कहीं किसी के साथ और फिर
मोहसिन भी घर की देख भाल में उलझ गए
— Mohsin Shaikh















