sur | सुरमई शाम है मौसम है सुहाना आना

  - Mubarak Siddiqi

सुरमई शाम है मौसम है सुहाना आना
इस से पहले कि मैं हो जाऊँ फ़साना आना

मुझ से पहले ही कई लोग ख़फ़ा रहते हैं
मुझ से जल जाए ज़रा और ज़माना आना

इक तिरा हुस्न गुलाबों सा ग़ज़ल सूरत है
इक ये सावन का महीना है सुहाना आना

रोज़ कहते हो मुझे आज तो ये है वो है
आज दुनिया से कोई कर के बहाना आना

आख़िरी जंग मैं लड़ने के लिए निकला हूँ
फिर रहे या न रहे तेरा दिवाना आना

लोग कहते हैं तुझे भूल के भी ज़िंदा रहूँ
मैं ने पूछा था मगर दिल नहीं माना आना

लोग तो लोग हैं जो चाहे वो कह सकते हैं
तू तो मेरा है मिरे दिल को दुखा न आना

तू भी शमशीर-ए-बदन मस्त-अदा तीर-ए-निगाह
मैं भी बैठा हूँ कि हो जाऊँ निशाना आना

दुश्मन-ए-जान समझता है कि तन्हा हूँ मैं
मैं ने दुश्मन को बताना है कि ना ना आना

मुस्कुराता हूँ मगर डर है किसी महफ़िल में
अश्क आँखों से न हो जाएँ रवाना आना

वो जो मा'सूम सा शाइ'र है 'मुबारक' 'अहमद'
उस का दुनिया में फ़क़त तू है ख़ज़ाना आना

  - Mubarak Siddiqi

Husn Shayari

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