darya-dili se abr-e-karam bhi nahin mila | दरिया-दिली से अब्र-ए-करम भी नहीं मिला

  - Munawwar Rana

दरिया-दिली से अब्र-ए-करम भी नहीं मिला
लेकिन मुझे नसीब से कम भी नहीं मिला

फिर उँगलियों को ख़ूँ में डुबोना पड़ा हमें
जब हम को माँगने पे क़लम भी नहीं मिला

सच बोलने की राह में तन्हा हमीं मिले
इस रास्ते में शैख़-ए-हरम भी नहीं मिला

मैं ने तो सारी 'उम्र निभाई है दोस्ती
वो मुझ से खा के मेरी क़सम भी नहीं मिला

दिल को ख़ुशी भी हदस ज़ियादा नहीं मिली
कासे के ए'तिबार से ग़म भी नहीं मिला

  - Munawwar Rana

Gham Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Munawwar Rana

As you were reading Shayari by Munawwar Rana

Similar Writers

our suggestion based on Munawwar Rana

Similar Moods

As you were reading Gham Shayari Shayari