न कमरा जान पाता है न अँगनाई समझती है
कहाँ देवर का दिल अटका है भौजाई समझती है
हमारे और उस के बीच इक धागे का रिश्ता है
हमें लेकिन हमेशा वो सगा भाई समझती है
तमाशा बन के रह जाओगे तुम भी सब की नज़रों में
ये दुनिया दिल के टाँकों को भी तुरपाई समझती है
मैं हर ए'ज़ाज़ को अपने हुनर से कम समझता हूँ
हुकूमत भीक देने को भी भरपाई समझती है
— Munawwar Rana















