तमाम लहजों में लहजा वही जो प्यार का है
तमाम तोहफ़ों में तोहफ़ा इक ए'तिबार का है
ख़िज़ाँ के बीज ज़मीनों में बो के बैठे हैं
और इंतिज़ार किसी मौसम-ए-बहार का है
किसी भी कार-ए-जुनूँ में कोई ख़सारा नहीं
ख़सारा कोई अगर है तो इंतिज़ार का है
तमाम सूद-ओ-ज़ियाँ का हिसाब रहता है
तअ'ल्लुक़ात का हर लहजा कारोबार का है
जवाब दूँ तिरे लहजे में दिल ये कहता है
मैं चुप रहूँ ये तक़ाज़ा मिरे वक़ार का है
— Naseem Syed















