और रास्ता चल रहा है

पोस्टर में वो जो लड़की हंस रही है
नौज़वां तन्हाइयों को डस रही है

समाँ सिर पर है, पैरों में ज़मीं है
कोई लाठी है न बम है
क्या ये कम है?

दूर बस्ती के किसी कोने में
काली दौलतों ने
थोड़ी तोड़ा फोड़ी की है
चलते फिरते शहर के
बस एक ही रस्ते में ग़म है
क्या ये कम है?

बाअसर लड़कों ने
इस नाज़ुक बदन से खेला
फिर उस को तोड़ डाला
टूटे-फूटे उस बदल का हाल
थाने में रक़म है
क्या ये कम है?

खेल यूँ हर जगह होता है जो
होता रहेगा....
जानवर हंसते रहेंगे
आदमी रोता रहेगा
ज़िंदा लाशें यूँ ही हर अख़बार में
जलती रहेंगी सरहदों पर
सरहदों की गोलियां चलती रहेंगी
ज़िन्दगी में फिर भी
सदियों से जिए जाने का दम है
क्या ये कम है...?

— Nida Fazli

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