शोहरत
इतना क़रीब आके वो अब दूर हो गया
शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
मेरे ही अंजुमन में हिफ़ाज़त मिली उसे
बसने को सरज़मीन मिली छत मिली उसे
मिल्लत की मिलकियत भी मिली हक़ मिला यहाँ
इज़्ज़त मिली रुआब भी बेशक मिला यहाँ
फिर क्यूँ वो अंजुमन को ही नासूर हो गया
शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
हम ने लहू से जिस्म के सींचा किया जिसे
हर एक इल्म और सलीक़ा दिया जिसे
मज़मून को उधेड़ के तरजीह दी मगर
गुस्ताख़ को फ़रेब दिखा था वो कम-नज़र
मय छोड़ वहम पी के वो मख़मूर हो गया
शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
था फ़र्ज़ मेरा मैं ने निभाया हर-एक पल
क्या ख़ूब क़र्ज़-दार था वो ज़र्रा-ज़र्रा छल
उस
में न एक रेशा भी ईमान रह गया
उस गोखरू से फट के गिरहबान रह गया
कर के मुख़ालिफ़त वो कहाँ नूर हो गया
शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
बचपन से बादशाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ
बख़्तर की कार-गाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ
शैतां भी मोच खा के दिखे लौटते हुए
ठकरा के शीश ख़ुद की अना कोसते हुए
यूँ ही न तोड़ तू इसे मशहूर हो गया
शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया















