जिन्होंने चोट खाई ही नहीं है
सुख़न उनकी कमाई ही नहीं है
बिछड़ कर उन सेे आधे रह गए हम
वो कहते हैं वफ़ाई ही नहीं है
कई दिन से मैं केवल सोचता हूँ
क़लम मैं ने उठाई ही नहीं है
मुझे फ़ुर्सत नहीं है बस कुछ इक दिन
कमी कुछ और आई ही नहीं है
ज़मीं का दिल दरकता 'नित्य' है पर
कोई बदली तो छाई ही नहीं है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Nityanand Vajpayee
our suggestion based on Nityanand Vajpayee
As you were reading Mazdoor Shayari Shayari