मसअला दिल का कभी हल न हुआ
एक वो शे'र मुकम्मल न हुआ
शख़्स ऐसा न अता करना ख़ुदा
आज मेरा हुआ पर कल न हुआ
मसअला गर जुदा होने का था
बे-वफ़ाई तो कोई हल न हुआ
आज़माना था तुझे भी जहाँ ने
इस
में क्या आज तू अव्वल न हुआ
उस की आँखों को था तकना पारस
और ये काम मुसलसल न हुआ
— Paras Angral















