'इश्क़ मुझ सेे यूँँ जताया करता था
शे'र मेरे ही सुनाया करता था
और क्या ही था जहाँ उसके सिवा
जिन दिनों मेरा कहाएा करता था
टूटकर रोए मिला जब यार जो
बात बचपन की बताया करता था
सोचता था एक हम हो या न हो
वो लकीरों को मिलाया करता था
नाम लेता था बिछड़ जाए अगर
वो मुझे बस आज़माया करता था
रूठ जाऊँ झूठ का ही मैं कभी
तो हज़ारों क़स
में खाया करता था
मान जाती मुस्कुराहट से ही मैं
वो सियाही ख़त में ज़ाया' करता था
साथ उसके घूम आती थी जन्नते
वो हसीं सपने दिखाया करता था
गर्म कैसे सर्द दिल उसने किया
है सुना वो ख़त जलाया करता था
वो बदल देता नियत को मेरी तब
देखकर जब मुस्कुराया करता था
चीज़ ये तो तोड़ने को है बनी
कौन वादों को निभाया करता था
'नूर' तेरी मौत उसको याद ना
क़ब्र पे जो रोज़ आया करता था
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