वो एक लड़की

कि जिस से शायद मैं एक पल भी नहीं मिली हूँ
मैं उस के चेहरे को जानती हूँ
कि उस का चेहरा
तुम्हारी नज़्मों तुम्हारी गीतों की चिलमनों से उभर रहा है
यक़ीन जानो
मुझे ये चेहरा तुम्हारे अपने वजूद से भी अज़ीज़-तर है
कि उस की आँखों में
चाहतों के वही समुंदर छुपे हैं
जो मेरी अपनी आँखों में मौजज़न हैं
वो तुम को इक देवता बना कर मिरी तरह पूजती रही है
उस एक लड़की का जिस्म
ख़ुद मेरा ही बदन है
वो एक लड़की
जो मेरे अपने गए जनम की मधुर सदा है

— Parveen Shakir

More by Parveen Shakir

Other nazm from the same pen

See all from Parveen Shakir →

DP Shayari

Shers of dp.

All DP Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling