आती है जब फ़लक से सदा कोई रोते हुए
चलती है तब हवा एक बारिश को ढोते हुए
रहती है बे-हिसी और चुप-चाप मैं बैठ कर
आब को देखता हूँ निशाँ कोई धोते हुए
घर के सब नूर को खा रही हैं मिरी ख़्वाहिशें
हर तरफ़ याँ अँधेरा है सूरज के होते हुए
इस लिए भी नहीं बुनता मैं ख़्वाब इन रातों में
तकता है रोज़ ये सहर-ए-ग़म मुझ को सोते हुए
टूटा जब तारा तो आँखें हर एक ने मूँद लीं
कोई तो देखता आसमाँ को भी रोते हुए
— Prakash Pandey














