जफ़ा के कूचे में चर्चा वफ़ा का क्यूँँ करे कोई

कहो पत्थर की इक मूरत पे सजदा क्यूँ करे कोई

यहाँ हर शख़्स ही लाचार फिरता है मुहब्बत में
हैं इतने ज़ुल्म तो ज़ुल्मों पे पर्दा क्यूँ करे कोई

रखूँ मैं बेरुख़ी दिल में कहूँ फिर इश्क़ है तुम से
फ़क़त रंगीन लफ़्ज़ों पे भरोसा क्यूँ करे कोई

किसी में दिल नहीं तो ख़ुद किसी के घाव हैं गहरे
बता बे-ख़ुद तिरे ज़ख़्मों का चारा क्यूँ करे कोई

जिसे देखो जहाँ में तुम वो ख़ुद को संत माने है
गिला कर फिर किसी से बैर झगड़ा क्यूँ करे कोई

यहीं जन्नत जहन्नम भी यहीं बेकार ही नम हो
चलो अच्छी दुआ कर लो तमाशा क्यूँ करे कोई

— Prakash Pandey

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