तुम को भी गर ठोकर में अपनी ये ज़माना चाहिए

अमा मियाँ कुछ तो हुनर तुम को भी आना चाहिए

आते हैं तेरी गली हर रोज़ फ़क़त दीदार वास्ते
कभी - कभी तुम्हें भी मेरी गली आना चाहिए

तोहफ़े में मिला गुलाब हाथों में लिए फिरते हो
इश्क़ है अभी नया नया इसे अभी छुपाना चाहिए

ख़्वाबों में ही आना मिलने मुझ से तुम हर बार
दरमियाँ अपने नहीं मुझ को ये ज़माना चाहिए

आशिक़ हूँ तुम्हारा मुझे आवारा न समझना तुम
यूँ बे-रुख़ी से इश्क़ नहीं आज़माना चाहिए

कितनी हसरत लिए आते हैं गली में तुम्हारी
तुम्हें भी तो एक दफ़ा दरीचे तक आना चाहिए

अच्छी लगती है अना शख़्सियत पर तुम्हारी
कुछ ग़ुरूर हमें भी अब ख़ुद पर आना चाहिए

रूठने का हक़ तुम्हारा ही नहीं मेरा भी तो है
मैं जो रूठूँ कभी तुम्हें भी मुझे मनाना चाहिए

— Prashant Shakun

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