आशिक़ अपनी विरासत सँभाले रहें
ज़ख़्म खाते रहें मुस्कुराते रहें
सच के पाले में हम भी तो कैसे रहें
चाहते हैं यही हम कि जीते रहें
उम्र भर तेरे आँचल से लिपटे रहें
हम सदा तेरी नज़रों में बच्चे रहें
है बिगाड़ा हमें सोहबत-ए- चाँद ने
हम वगरना शबों में तो घर पे रहें
क़ुर्बतों में बस इतनी ही दूरी रहे
ज़ख़्म महबूब के हम को दिखते रहें
तू जो मिलने लगी है मुहब्बत से अब
हम मुक़द्दर के मारे भी कैसे रहें
हों लिखे काँटे अपने मुक़द्दर में पर
फूल उस के बग़ीचे में खिलते रहें
आइनों से तक़ाज़ा नहीं है कोई
बस हमारे मुताबिक़ ये चलते रहें
— Pravendra Anuragi















