एक चिंगारी को ऐसे वो हवा देता था

आग के बनने से पहले ही बुझा देता था

इस तरह से वो चराग़ों को सज़ा देता था
सुब्ह होते ही उन्हें रोज़ जला देता था

जैसे ही कोई नया ख़्वाब सजाता था मैं
लम्स तेरा मुझे नींदों से जगा देता था

पूछिए मत कोई हद मेरे तअल्लुक़ की अब
मेरा तो हाल वो आँखों से बता देता था

तन्हा रहने का उसे शौक़ लगा था मानो
रोज़ पेड़ों से परिंदों को उड़ा देता था

काटता था वो अँधेरों में जो टहनी हर शब
उन को फलने की उजालों में दुआ देता था

आइना झूठ नहीं बोलता था पहले कभी
किस की दस्तार गिरेगी ये बता देता था

— Pravendra Anuragi

More by Pravendra Anuragi

Other ghazal from the same pen

See all from Pravendra Anuragi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling