झूठी क़समों का मुझे रोज़ हवाला दे कर
छीन लेता है सहारा वो सहारा दे कर
वो नसीहत मुझे देता है सँभलने की रोज़
और ख़ुद मय भी पिलाता है पियाला दे कर
मुद्दतों उसने निगहबानी में रक्खा मुझ को
और तोड़ा है भरोसा भी भरोसा दे कर
इस क़दर डूब न जाना कहीं भी दरिया में
लौटना टूटे सफ़ीने को किनारा दे कर
मैं ने हँसते हुए चेहरे से किया है रुख़्सत
और लौटा हूँ मिरे ग़म को तमाचा दे कर
मरने वाला किसी को याद कहाँ आता है
वो तो मर जाता है दुनिया को इशारा दे कर
— Pravendra Anuragi















