ऐसा महसूस जब हो कि जन्नत में है
समझे माँ बाप की फिर रियासत में है
मिलता है चैन जिन की पनाहों तले
इक अजब सा सुकूँ इस ज़ियारत में है
हस्ती मेरी तो उन से ही महफ़ूज़ सी
ज़िंदगी ये मेरी तो हिफ़ाज़त में है
हँस के जो वारते मुझ पे जग की ख़ुशी
ये अदा बाग़बाँ की ही फ़ितरत में है
'प्रीत' कुछ भी न तो और अब चाहती
इन लकीरों की वो तो रफ़ाक़त में है
— Harpreet Kaur















