कभी ज़िंदगी से मुलाक़ात होगी
मुयस्सर सुकूँ ऐसी भी रात होगी
मुहब्बत ककहरा न उन को पता है
तो फिर कैसे जज़्बात की बात होगी
ज़रूरी है माज़ी को अब भूलना भी
नए रब्त की तब ही सौग़ात होगी
गिला शिकवा रखना चलो छोड़ते हैं
यूँ लहजे में शामिल मदारात होगी
लगा बैठा हर कोई दिल फोन में जो
दिलों में यूँ बढ़ती मसाफ़ात होगी
मुरादों से आई शब-ए- वस्ल दिलबर
ख़ुशी में भी अश्कों की बरसात होगी
लिखें शे'र जो प्रीत ने इतने सारे
करें बस नहीं तो ख़ुराफ़ात होगी
— Harpreet Kaur















