कहीं माशूक़ा वो फिर से फिसल जाए तो क्या होगा

यूँ दिल की कोई हसरत फिर मचल जाए तो क्या होगा

मिलें नज़रों से नज़रें धड़कनें लगती हैं बढ़ने सी
अगर बीवी का बेलन सर पे चल जाए तो क्या होगा

सुहानी रात बिजली भी हुई गुल छाई तन्हाई
पकाए बिन ही अब खाना निगल जाए तो क्या होगा

बहारों की भी घर की भी वो तो है मल्लिका दिल की
कभी उस का ही तेवर फिर बदल जाए तो क्या होगा

हमेशा से क़फ़स लगती मुहब्बत प्रीत की उन को
यूँ हो बेज़ार ख़ुद से दिल बहल जाए तो क्या होगा

— Harpreet Kaur

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