लगे ये दुश्मनी को ही निभाता हो कोई जैसे
बिठा डोली में आफ़त को भी लाता हो कोई जैसे
सुकूँ मिलता न दिल का चैन भी ग़ाएब हुआ है यूँ
कि टब भर भर के अश्कों से नहाता हो कोई जैसे
नवाबों सी वो हस्ती थी कभी ख़्वाबों की बस्ती थी
बने शौहर हक़ीक़त अब दिखाता हो कोई जैसे
सहे हँस कर किसी से भी गिला शिकवा नहीं करते
ले कर के नाम बीवी का सताता हो कोई जैसे
मना है कहना दिल दुखता हमारा भी है थोड़ा तो
ग़मों से भी पुराना सा ही नाता हो कोई जैसे
नहीं वो स्वाद घर के खाने में अब तो न आता है
लगे बाहर की बिरयानी खिलाता हो कोई जैसे
कहे ये प्रीत तस्वीरें तो शादी की छलावा सी
तमाशा सा यहाँ हर इक दिखाता हो कोई जैसे















