मुहब्बत में वो आज़माने लगे हैं
बहाने बना दूर जाने लगे हैं
मचाने लगी शोर ये ख़ामुशी जो
वो यादों के साए सताने लगे हैं
फ़ज़ा में महक आज भी वो है क़ायम
जो गुल आरिजों पे खिलाने लगे हैं
यक़ीं नेमतों पे हुआ ऐसे है अब
ख़ुदा सामने सिर झुकाने लगे हैं
सलीक़ा यही 'प्रीत' इस ज़िन्दगी का
लबों पे हँसी को सजाने लगे हैं
— Harpreet Kaur















