सभी कहते यही बेगम से रौनक़ होती घर भर की
कहाँ जाने कोई हालत बिचारे अदना शौहर की
कभी झड़ते लबों से फूल थे रुख़्सार पे कलियाँ
ज़बाँ खुलते ही अब बौछार पत्थर और नश्तर की
ज़रूरी देना तोहफ़े क़ीमती मौक़ा न भी हो तो
सुकूँ पाने को बिन बोले समझ ले बात दिलबर की
पसीना वो बहाता वो कमाता आदमी जो है
उड़ाती औरतें ये कह के दौलत तो मुक़द्दर की
दिखाई देते तस्वीरों में हँसते मुस्कुराते से
ज़माने को पता क्या हो हक़ीक़त जो है अंदर की
— Harpreet Kaur















