ज़िन्दगी से रहा अब गिला ही नहीं
हसरतों का तो होता सिरा ही नहीं
हिस्से में आए शौहर के ही नख़रे अब
प्यार इक़रार सा कुछ मिला ही नहीं
चाँद तारों की देखी झलक खिड़की से
आरज़ूओं का सूरज दिखा ही नहीं
ये नज़र फोन में घूमती रहती है
इस से बढ़ कर कोई अब नशा ही नहीं
अजनबी बन के रहते जो अपने भी हैं
कैसे रिश्ते निभाते पता ही नहीं
फूल खिलते हैं मौसम के ही आने पे
इन दरख़्तों की कोई ख़ता ही नहीं
प्रीत कहती है शादी तो होती बदी
सारी दुनिया में ऐसी सज़ा ही नहीं
— Harpreet Kaur















