रात दिन एक बेक़रारी है
सारा दिन सारी रात भारी है
अब नहीं है जो ज़िंदगी अपनी
अब वही ज़िंदगी हमारी है
ख़ामुशी आज़माइश आख़िरी थी
ख़ामुशी ज़ार ज़ार हारी है
हम जो ऐसे उदास रहते हैं
शौक़ है और शौक़ तारी है
बात करनी या बात कहनी है
बस यही बात बात सारी है
भर गया दिल में कोई ख़ाली-पन
और क्या है जो दिल में भारी है
फिर वही शक्ल चाहती है याद
अब जिसे भूलने की बारी है
— pankaj pundir















