ghar basa kar bhi musaafir ke musaafir thehre | घर बसा कर भी मुसाफ़िर के मुसाफ़िर ठहरे

  - Qaisar-ul-Jafri

घर बसा कर भी मुसाफ़िर के मुसाफ़िर ठहरे
लोग दरवाज़ों से निकले कि मुहाजिर ठहरे

दिल के मदफ़न पे नहीं कोई भी रोने वाला
अपनी दरगाह के हम ख़ुद ही मुजाविर ठहरे

इस बयाबाँ की निगाहों में मुरव्वत न रही
कौन जाने कि कोई शर्त-ए-सफ़र फिर ठहरे

पत्तियाँ टूट के पत्थर की तरह लगती हैं
उन दरख़्तों के तले कौन मुसाफ़िर ठहरे

ख़ुश्क पत्ते की तरह जिस्म उड़ा जाता है
क्या पड़ी है जो ये आँधी मिरी ख़ातिर ठहरे

शाख़-ए-गुल छोड़ के दीवार पे आ बैठे हैं
वो परिंदे जो अंधेरों के मुसाफ़िर ठहरे

अपनी बर्बादी की तस्वीर उतारूँ कैसे
चंद लम्हों के लिए भी न मनाज़िर ठहरे

तिश्नगी कब के गुनाहों की सज़ा है 'क़ैसर'
वो कुआँ सूख गया जिस पे मुसाफ़िर ठहरे

  - Qaisar-ul-Jafri

Ghar Shayari

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