tu apne phool se honton ko raayegaan mat kar | तू अपने फूल से होंटों को राएगाँ मत कर

  - Qaisar-ul-Jafri

तू अपने फूल से होंटों को राएगाँ मत कर
अगर वफ़ा का इरादा नहीं तो हाँ मत कर

तू मेरी शाम की पलकों से रौशनी मत छीन
जहाँ चराग़ जलाए वहाँ धुआँ मत कर

फिर इस के बा'द तो आँखों को संग होना है
मिली है फ़ुर्सत-ए-गिर्या तो राएगाँ मत कर

छलक रहा है तिरे दिल का दर्द चेहरे से
छुपा छुपा के मोहब्बत को दास्ताँ मत कर

तू जाते जाते न दे मुझ को ज़िंदगी की दुआ
मैं जी सकूँगा तिरे बा'द ये गुमाँ मत कर

  - Qaisar-ul-Jafri

Irada Shayari

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