मिरी ज़मीं तिरे अफ़्लाक से ज़ियादा है
मुझे ये ख़ाक हर इक ख़ाक से ज़ियादा है
निगार-ख़ाना-ए-दुनिया मुझे दरीदा लिबास
तिरी अता-शुदा पोशाक से ज़ियादा है
शिकस्ता जिस्म अलग चीज़ है मगर तिरा ज़ुल्म
कहाँ मिरे दिल-ए-बे-बाक से ज़ियादा है
कहानी-कार तुझे क्या ख़बर ये शहर दुखी
तिरे फ़साना-ए-ग़म-नाक से ज़ियादा है
मैं बुझ रहा हूँ मगर मेरी रौशनी 'शहज़ाद'
चराग़-ए-खेमा-ए-इदराक से ज़ियादा है
— Qamar Raza Shahzad















