sawaal ghar nahin buniyaad par uthaya hai | सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है

  - Rahat Indori

सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है
हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है

हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की
ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है

मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था
मगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है

यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन हम को
ये आसमान जिसे दोश पर उठाया है

बुलंदियों को पता चल गया कि फिर मैं ने
हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है

महा-बली से बग़ावत बहुत ज़रूरी है
क़दम ये हम ने समझ सोच कर उठाया है

  - Rahat Indori

Hawa Shayari

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