इक अदद जो घर न पाए आज तक
मर के भी वो मर न पाए आज तक
उनका बिस्तर था धरा चद्दर गगन
क्या हुआ कुछ ग़र न पाए आज तक
चार दिन का ही तो केवल काम था
ख़त्म लेकिन कर न पाए आज तक
क्या बताएंगे वो रस्ता यार जो
राह में पत्थर न पाए आज तक
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