कितने मुश्किल हैं ये रस्ते देख लो
और हम इन ही पे चलेंगे देख लो
तुम अँधेरे पे ही क्यूँ करते हो ग़ौर
चाँद देखो या सितारे देख लो
फेंक दो औरों के चश्मों को कहीं
और मुझे अपनी नज़र से देख लो
कुछ दिनों की अक़्ल तो आ जाती है
गर मोहब्बत में तमाशे देख लो
ये हक़ीक़त भी हो जाते हैं कभी
इस लिए भी थोड़े सपने देख लो
रात कैसे सोने दे सकती है फिर
चाँद को गर दिन-दहाड़े देख लो
तुम से तो सूरज बस इतना कहना है
मेरे घर के भी दरीचे देख लो
वक़्त-ए-रुख़्सत है नहीं रोऊँगा मैं
क्या पता तुम पीछे मुड़ के देख लो
आँखें होकर भी नहीं देखेंगे लोग
सो हम अंधों से कहेंगे देख लो
— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'















