वक़्त के साथ ज़ख़्म भरते हैं

दाग़ लेकिन वहीं ठहरते हैं

जिन से आखें मिला नहीं सकते
कैसे कह दें कि प्यार करते हैं

आदमी हुस्न का दिवाना है
रात रानी पे हम भी मरते हैं

आप दुत्कार दें ये लाज़िम है
आपसे प्यार भी तो करते हैं

मौत का सामना तो बर-हक़ है
हम तो अब ज़िंदगी से डरते हैं

हाँ अना के मरीज़ हैं हम भी
कैसे कह दें कि प्यार करते हैं

तीरगी रास आ गई 'राकेश'
ख़ैर हम रौशनी पे मरते हैं

— Rakesh Mahadiuree

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